खेल महासंघ एक अभिशाप

भारतीय रोलर स्केटिंग महासंघ
क्या इतना कमजोर है कि हर बार दूसरों द्वारा किए गए कुछ भी कार्यों से डर कर अपने फेसबुक के माध्यम से खिलाड़ी और प्रशिक्षकों को आगाह और चेतावनी देता है ?

स्पष्ट कारण यह है की भारतीय स्पीड स्केटिंग की विश्व में कहीं पर भी जगह नहीं है,

विश्व स्पीड स्केटिंग रैंकिंग में भारत का स्थान 90 से 100 वे लेवल पर है।

आप लोग सिर्फ दूसरों को रोकने की बजाय खुद के कार्यों को बेहतर ढंग से अगर करोगे तो शायद विश्व में भारतीय स्पीड स्केटिंग को कहीं स्थान मिलेगा,

आज जो भी खिलाड़ी राष्ट्रीय स्तर पर अच्छा प्रदर्शन करते हैं उनमें से 90% खिलाड़ी कोलंबिया या दूसरे देशों में जाकर महीनों रहकर लाखों रुपए खर्चा कर
वहां का तकनीक सीख कर अपने देश में उम्दा प्रदर्शन करते हैं, पर क्या हर खिलाड़ी को यह संभव है ?

हमेशा किसी ना किसी प्रकार से खिलाड़ी और प्रशिक्षकों को रोकने की कोशिश करने वाले पत्र जारी करता रहता है,
इसकी बजह  अगर आप खिलाड़ियों को आगे बढ़ने के लिए मौका दें तो आज भारत में भी खिलाड़ियों की संख्या बढ़ती जाएगी,

भारत में जनसंख्या के आधार पर 50,000 खिलाड़ी भी रजिस्टर नहीं है,

130 करोड़ की जनसंख्या वाले देश में आज इस तरह से इस खेल का हाल है,

राष्ट्रीय खेल महासंघ होने के बावजूद आज तक स्केटिंग के ट्रैक आपके द्वारा बनाये नहीं गये है,

ज्यादा कर राज्य संगठन जिनके पास है वह लोग अपने कोचिंग सेंटर, स्कूल कोचिंग और बाकी जगह चला कर मोटी आमदनी कमा रहे हैं,
या खेल उपकरण की डीलरशिप चला रहे हैं।

खेल विकास करने की भावना उनके अंदर कहां से दिख रही है ?

जो भी राज्य या राष्ट्रीय महासंघ से जुड़े हैं या तो वह स्केटिंग बनाने वाली कंपनी चला रहे हैं या गवर्नमेंट के कंपलेक्स फेडरेशन के नाम पर लीज पर लेकर वहां अपने कोचेस भेज कर अपना रोजगार तो बहुत अच्छी तरह से कर रहे हैं,

परंतु जो गरीब कोचेस 10,000 15,000 रुपए महीने की सैलरी में स्कूल में काम करते हैं और प्राइवेट कोचिंग से पांच ₹10000 की आमदनी करके अपना घर परिवार चलाते हैं ऐसे कोचेस की थाली में भी इन लोगों की नजर गिरती है।

हर बच्चा नेशनल या राज्य प्रतियोगिता में खेल नहीं सकता है कुछ दिनों तक वह स्केटिंग करेगा फिर स्केटिंग छोड़ देगा इसमें नुकसान कोचेस को  होगा जिसकी आमदनी और घर उसी ट्रेनिंग से चलता है,

ऐसे बच्चों को रोके रखने के लिए ओपन प्रतियोगिताओं का होना जरूरी है ताकि वह आगे बढ़े और उनमें से कुछ अच्छे खिलाड़ी देश को मिले,

पर शायद दूसरों की थाली में नजर रखने वाले लोग यह नहीं समझ सकते,

विश्व में ज्यादातर देशों में खिलाड़ियों को फ्री हैंड दिया हुआ है,
वह जहां चाहे वहा खेल सकते हैं।

विश्व में गिने-चुने कुछ तानाशाही वाले देश है जिनमें लोकतंत्र नहीं है ऐसे देशों में ही खिलाड़ियों को नियंत्रण में रखा जाता है उदाहरणार्थ पड़ोसी देश चीन

शायद वर्ल्ड स्केट एशिया के अधीन कार्य करने वाली यह राष्ट्रीय फेडरेशन भी उन्हीं के मार्ग पर चल रही है,

करोना काल के चलते पहले ही हजारों COACHES
अपनी जॉब से हाथ धो चुके हैं

कहीं से कोई प्रतियोगिता होती है जिसमें खेलने के लिए उनकी क्लास में बच्चों का फिर से आना शुरू होगा जिससे उन्हें कुछ आमदनी होगी और उनके घर परिवार की रोजी-रोटी चलेगी पर उनकी थाली पर भी नजर रखने वाले गीध हर जगह दिख रहे हैं।

सालाना करोड़ों रुपए की आमदनी करने वाले महा संघ और राज्य संघ के पदाधिकारी जिनके खुद के कोचिंग सेंटर और स्पोर्ट्स इक्विपमेंट्स बेचने के धंधे है,
वह लोग गरीब कोचेस का हक मार रहे हैं और सरकारी मान्यता का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं,
सरकार किसी भी खेल महासंघ को मान्यता देती है खेल विकास के लिए,
रोलर स्केटिंग महासंघ के लोग सरकारी मान्यता को खेल की जागीर बताकर संपूर्ण देश में खिलाड़ी और प्रशिक्षकों को दहशत में रख रहे हैं,
उदाहरण के तौर पर उनके द्वारा जारी किए हुए पत्र एस ब्लॉक के साथ जोड़ रहा हूं,

मीडिया को इस खेल से लेना देना नहीं है,
चतुर्थ श्रेणी में आने वाला खेल इसीलिए इस खेल की पब्लिसिटी होती नहीं है पर इस खेल के साथ 10 लाख से ज्यादा लोग जुड़े हुए हैं,

20,000 स्केटिंग प्रशिक्षक संपूर्ण भारत में अपनी और परिवार की जीविका इसी खेल के माध्यम से कमाते हैं, 

खेल महासंघ हर बार गरीब प्रशिक्षकों को धमकी भरे पत्र देकर उन्हें डराता है कि अगर किसी ओपन प्रतियोगिता में खेलोगे तो आप पर प्रतिबंध लगा दिया जाएगा और जिस स्कूल में आप जॉब कर रहे हो वहां से आप को निकलवा दिया जाएगा,

सरकार से अनुरोध है जल्द ही इन लोगों पर उचित कार्रवाई होना अत्यंत आवश्यक है,
क्या सरकार इंतजार कर रही है कि कोई प्रशिक्षक इन के दबाव में आकर आत्महत्या कर ले ?

आमदनी के सारे रास्ते इस तरह के खेल महासंघ के पदाधिकारी रोक रहे हैं तो व्यक्ति क्या करेगा ?

सरकारी मान्यता का गलत इस्तेमाल होना और वर्तमान पत्रों में प्राइवेट प्रशिक्षकों को फर्जी बताना कहां तक सही है ?

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