Dictatorship of sports federation in India

 राष्ट्रीय खेल महासंघ द्वारा खेल को अपनी जागीर समझना भारतीय खेलों के लिए और खिलाड़ियों के लिए नुकसानदायक होने वाला है, 


खेल संघ और महासंघ हमेशा खिलाड़ी और प्रशिक्षकों पर दबाव बनाते हैं कि सिर्फ उनके द्वारा आयोजित प्रतियोगिताओं में ही खेलना अनिवार्य है,


और हर बात पर सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त होने का फायदा उठाते हैं,


सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त होना क्या खेल उनकी जागीर हो जाती है?


जैसे सरकारी स्कूल होते हैं वैसे ही प्राइवेट स्कूल भी होते हैं और हर जगह प्राइवेट ट्यूशन और कोचिंग सेंटर भी होते हैं,


सरकार किसी भी खेल संघों को मान्यता देती है उस खेल की प्रतियोगिताओं का आयोजन करके राष्ट्रीय स्तर पर खिलाड़ियों का चयन किया जाए और उन्हें अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में सम्मिलित करने भेजा जाए,


इसका मतलब यह कदापि नहीं है कि खेल पूर्णता एसोसिएशन वालों की जागीर हो जाता है,


इनके मनमानी कारोबार के चलते

खिलाड़ियों का बहुत नुकसान होरहा है,

ऐसा ही उदाहरण भारतीय रोलर स्केटिंग महासंघ और उनके द्वारा मान्यता प्राप्त राज्य संघ के बारे में

महत्वपूर्ण जानकारी,

रोलर स्केटिंग खेल भारत में चतुर्थ श्रेणी में आता है,

फिर भी इस खेल में लगभग 500000 से अधिक खिलाड़ी और 20,000 से अधिक प्रशिक्षक संपूर्ण भारत में है,


इस खेल में लाखों रुपए के उपकरण इस्तेमाल करने वाले खिलाड़ी जो अपने पैसे के दम पर बाहर देशों में जाकर प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं और राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में उस प्रशिक्षण के बलबूते पर पदक जीतते हैं,


सामान्य वर्ग के खिलाड़ी जो सस्ते वाले उपकरण यूज़ करके इस खेल में खेलना चाहते हैं ऐसे खिलाड़ियों को हर जगह से रोककर उन्हें बढ़ने नहीं दिया जाता है,


खेल महासंघ के पदाधिकारी और राज्य संघ के लोग

सभी खिलाड़ी और प्रशिक्षकों को धमकी भरे पत्र और जिस स्कूल में वह पढ़ते हैं या जॉब करते हैं वहां से निकलवाने की धमकियां यह लोग देते रहते हैं,


इनका कहना है कि सिर्फ हमारे द्वारा आयोजित प्रतियोगिताओं में ही खेलना अनिवार्य है अन्यथा आप पर प्रतिबंध लगा दिया जाएगा,

हम सरकार से पूछना चाहते हैं कि इस तरह की मनमानी करने वाले

महासंघ और उनके द्वारा मान्यता प्राप्त राज्य संघ को यह अधिकार किस अधिनियम के तहत लोकतांत्रिक देश में दिया गया है ?


एक तरह से भारत को लोकतांत्रिक देश कहा जाता है और तानाशाही करने वाले खेल महासंघ भारत में मनमानी करके

करोड़ों रुपए सालाना की आमदनी बटोर रहे हैं,


एक खिलाड़ी से रजिस्ट्रेशन के नाम पर ₹350 सालाना

उसके पश्चात जिला स्तरीय प्रतियोगिता के लिए ₹500,

राज्य प्रतियोगिताओं के लिए 1000 रुपए,

और राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के लिए ₹2000 तक की फीस

खिलाड़ियों से लेते हैं, 


उसके पश्चात भी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता और एशियन प्रतियोगिताओं में सम्मिलित होने के लिए ट्रेनिंग / सिलेक्शन कैंप का आयोजन होता है उसकी फीस 5000 से ₹10000 प्रति खिलाड़ी होती है,

 खिलाड़ी का चयन होने के बाद देश के नाम खेलने के लिए उस खिलाड़ी को ₹200000 तक की राशि इस फेडरेशन को देनी पड़ती है,


एक टीम में सारी तरह के रोलर् स्केटिंग  प्रकार मिलाकर 100 से ज्यादा खिलाड़ी सम्मिलित होते है,

साल में तीन तरह की अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताएं होती है.


तो आप कुल मिलाकर सोचिए रजिस्ट्रेशन फीस

350× 100000 = 3.5 करोड़ 

जिला और राज्य और राष्ट्रीय प्रतियोगिता की फीस


20000× 3000= 6 करोड़

सिलेक्शन कैंप फीस


5000 × 1000 = 50 लाख


और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता की फीस

200000 × 300 = 6 करोड़

उसके साथ क्लब की एफिलेशन फीस 

तहसील और जिला की ,राज्य एफिलेशन फीस।


कुल मिलाकर सालाना 15 से ₹20 करोड़ की आमदनी, 

साथ ही खेल महासंघ से जुड़े हुए पदाधिकारी और इनके राज्य संघ के पदाधिकारी

ज्यादातर सभी स्कूलों में अपने हि कोचेस भेजते है, 

कम सैलरी में गरीब कोचेस को स्कूल में भेजते हैं और स्कूल की तरफ से मोटी रकम स्वता रखते हैं,

और स्केटिंग उपकरण बेचकर सालाना करोड़ों रुपए कमाते हैं,


जो स्वाभिमान कोच अपना स्वयं का प्रशिक्षण केंद्र चलाते हैं ऐसे लोगों को डराया धमकाता जाता है,

आपके खिलाड़ियों को हमारे पास भेजिए, 

आप किसी और प्रतियोगिता में खेलोगे तो आप को बैन किया जाएगा,

प्राइवेट क्लब के खिलाड़ियों को जिला और राज्य प्रतियोगिताओं में खेलने से रोका जाता है,

और कोई कोच ओपन प्रतियोगिताओं में जहां बच्चों को मार्गदर्शन मिलता है और खेलने का अनुभव मिलता है ऐसी जगह गया तो यह लोग उस कोच को डराना धमकाना अखबारों में उसके खिलाफ गलत बयान देना और उसे फर्जी कहना, दूसरी प्रतियोगिताओं को अवैध ठहराना इस तरह के काम यह लोग बहुत ही अच्छी तरह से कर रहे हैं,

आज संपूर्ण भारत में 500000 से 1000000 बच्चे रोलर स्केटिंग सीखते हैं,

उनमें से कितने बच्चे ऐसी राज्य और राष्ट्रीय खेल संघों के प्रतियोगिताओं में खेलने के लिए जाते हैं?

ज्यादा से ज्यादा 70,000 से 1 लाख


बाकी के बच्चे शौकिया तौर पर खेल को खेल कर किसी भी ओपन प्रतियोगिताओं में खेलना उन्हें पसंद होता है,


ओपन प्रतियोगिताएं खेल को हमेशा बढ़ावा देती है,


खेल महासंघ द्वारा आयोजित प्रतियोगिता साल में एक या दो बार ही हो सकती है,

वैसे ही राज्य संघ द्वारा आयोजित प्रतियोगिता भी एक या दो बार ही हो सकती है,

अगर किसी ओपन प्रतियोगिताओं में बच्चों को खेल की जानकारी और अनुभव मिलता है,

उसी की मदद से कुछ खिलाड़ी देश के लिए पदक जीतने लायक भी बन सकते हैं

पर इन खेल संघों की मनमानी के चलते ऐसे खिलाड़ी क्लब लेवल से ही खेल को छोड़ देते हैं,

अब सवाल आता है क्या लोकतांत्रिक देश में मनमानी और खेल को अपनी जागीर समझना मक्तेदारी समझना और खेल पर सर्वत्र हमारा ही अधिकार है यह साबित करने की कोशिश करना कहां तक सही है?


भारतीय खेल प्राधिकरण और खेल मंत्रालय क्यों ऐसे लोगों पर लगाम नहीं लगा रहा है ?


जो खिलाड़ी राष्ट्रीय प्रतियोगिता में खेलते हैं वह लाखों रुपए के उपकरण उसके साथ तीन प्रकार के व्हील सेट 50 हजार तक होते हैं

अत्याधुनिक तकनीकी बेरिंग

जिसकी कीमत 15000 से ₹40000 तक होती है, 

लाखो रुपए सामना ट्रेनिग फीस देकर


वह खिलाड़ी अपने पैसों के दम पर प्रतियोगिताओं में जीतते हैं, 


गरीब और मध्यमवर्गीय खिलाड़ियों के लिए साधारण उपकरण के चलते ऐसी प्रतियोगिताओं में जीतना आसान नहीं होता है,

और खिलाड़ियों को ओपन प्रतियोगिताओं में खेलकर मार्गदर्शन मिलता है और प्रोत्साहन भी मिलता है,


ऐसी ओपन प्रतियोगिता में खिलाड़ियों का मनोबल अधिक बलवान होता है,


इसी मनोबल के चलते खेल भावना का विकास होकर अच्छे खिलाड़ी बन सकते हैं,


पर खेल महासंघ के पदाधिकारी यह नहीं चाहते हैं कि मध्यमवर्गीय खिलाड़ी और गरीब कोचेस को आगे बढ़ाया जाए,


इस तरह की स्वार्थी मानसिकता वाले पदाधिकारी करोड़ों अरबों रुपए कमाने के बाद भी गरीब कोचेस का मुंह का निवाला छीन रहे हैं,

जैसा कि हम देखते हैं सरकार द्वारा इन्हें मान्यता दी गई है सिर्फ खेल के विकास के लिए और राज्य राष्ट्रीय प्रतियोगिता का आयोजन करके खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के लिए चयन करना यह इनकी जिम्मेदारी है,


फिर भी यह लोग हर तरह के ओपन प्राइवेट टूर्नामेंट को फर्जी बताकर खिलाड़ियों को डराते धमकाते रहते हैं,

जितनी ऊर्जा दूसरों को रोकने में लगाते हैं अगर उतनी उर्जा खेल विकास में लगाई होती तो आज भारतीय रोलर स्केटिंग खेल की दुर्दशा नहीं होती थी,


1955 से भारतीय रोलर स्केटिंग महासंघ काम कर रहा है


इस महासंघ ने आज तक एक भी स्केटिंग का ट्रैक अपने बलबूते पर नहीं बनाया है,


विश्व रैंकिंग में भारत का स्थान 100 से अधिक नंबर पर आता है,

आज तक स्पीड स्केटिंग में भारत को एक भी पदक विश्व प्रतियोगिता में नहीं मिला है, 

खेल महासंघ के पदाधिकारी परिवार के साथ में अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता में घूमने जाते हैं 

उनके टिकट का और वहां का खर्चा कौन करता है इसकी जांच होनी चाहिए?


देश में कहीं भी किसी भी जगह जाना हो तो महासंघ के पैसों पर हवाई यात्रा करते हैं,


अपने घर को महासंघ का ऑफिस बताकर लाखों रुपए सालाना का किराया वसूलते हैं,


15 से 20 करोड़ रुपए लगभग

सालाना आमदनी वाले खेल महासंघ खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता के टिकट भी मुहैया नहीं करवा सकते हैं, 


सभी पालक गण से विनम्र विनती है अपने बच्चों को ऐसी खेल महासंघ और इनके द्वारा मान्यता प्राप्त राज्य संघ की प्रतियोगिताओं से कम से कम 2 साल तक दूर रखें,


2 साल तक उन्हें ओपन प्रतियोगिताओं में ही खिलाएं

ताकि उन्हें खेल का अच्छी तरह से ज्ञान हो,

आप समझ लीजिए कि जिन लोगों को यह खेल संघ के लोग फर्जी कहते  है

और ओपन प्रतियोगिताओं से आपको दूर रहने की सलाह देते हैं आप समझ जाइए की इन महासंघ के लोगों का स्वार्थ पूरा नहीं हो रहा है।

बहुत जल्द भारत में ARSEC ASIA प्राइवेट कंपनी के माध्यम से

लाखों रुपए धन राशि जीतने का मौका खिलाड़ियों को मिलने वाला है,


एक ऐसी प्रतियोगिता का आयोजन होने वाला है जिस प्रतियोगिताओं में जीतने वालों को लाखों रुपए का इनाम मिलेगा,


ऐसी प्रतियोगिताओं को भी खेल महासंघ के स्वार्थी भ्रष्टाचारी पदाधिकारी फर्जी कहेंगे यह तो हमें पता है, 

 अपने सोशल मीडिया के माध्यम से पत्र जारी करेंगे वही पत्र दूसरे सोशल मीडिया पर अपने चमचों द्वारा प्रसारित करेंगे,

खिलाड़ियों को और कोचेस को डराना यही इनका हथकंडा होता है


खेल प्राधिकरण और खेल मंत्रालय से आशा है कि जल्द ही ऐसे भ्रष्ट लोगों पर उचित कार्रवाई हो और आजादी के 75 साल बाद खेल जगत को खेल महासंघ की गुलामी से आजादी मिले।


जय हिंद


आशीष पंचभाई

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